मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलीगढ़ आगमन के पीछे कई महत्वपूर्ण राजनीतिक कारण थे। उनके इस दौरे का मुख्य उद्देश्य अलीगढ़ को 462 करोड़ रुपये (कुछ स्रोतों के अनुसार 957 करोड़ से अधिक) की 85 विकास परियोजनाओं की सौगात देना था, जिसमें पेयजल पुनर्गठन स्कीम, विधि विज्ञान प्रयोगशाला और अतरौली में डिग्री कॉलेज जैसे प्रोजेक्ट शामिल थे,,। प्रशासनिक रूप से, उन्होंने राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों का स्थलीय निरीक्षण किया और कलेक्ट्रेट में लोक निर्माण विभाग (PWD) की परियोजनाओं एवं जिले की कानून-व्यवस्था की उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक की।
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| अलीगढ़ में मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और आम नागरिकों की परेशानियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। |
राजनीतिक दृष्टिकोण से यह दौरा चुनाव में भाजपा सांसदों की जीत के लिए जनता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने और 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए विकास का रोडमैप तैयार करने के लिहाज से महत्वपूर्ण था। इसके अतिरिक्त, उन्होंने नुमाइश मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया, जहाँ आयुष्मान कार्ड और आवास की चाबियाँ वितरित की गईं, और अलीगढ़ की कचौड़ी को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए उसे ओडीओडी (ODOP) में शामिल करने का बड़ा ऐलान किया। हालांकि, लखनऊ में हुए दुखद अग्निकांड के कारण उन्हें यह दौरा बीच में ही छोटा करना पड़ा।
ताला नगरी का कड़वा सच: विकास का ढोंग या वीवीआईपी संस्कृति का नंगा नाच? एक ग्राउंड रिपोर्ट
आज मैं आपको उस अलीगढ़ की सैर कराऊंगा जिसे न तो सरकारी विज्ञापनों में दिखाया गया और न ही 'महाराज' के मंच से सुनाया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दो दिवसीय दौरा हुआ, करोड़ों की योजनाओं के पत्थर गाड़े गए, लेकिन इस 'चमक-धमक' के पीछे जो सिसकियाँ और जो प्रशासनिक नंगा नाच हुआ है, उसे देखकर आपकी रूह कांप जाएगी। क्या यह विकास है या बस 2027 के चुनाव के लिए बिछाई गई एक सियासी बिसात?
रातों-रात 'जापान' बनाने का प्रशासनिक तमाशा
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रातों-रात 'जापान' बनाने का प्रशासनिक तमाशा |
लेकिन शर्म की बात देखिए, यह सारी मशक्कत पूरे अलीगढ़ के लिए नहीं थी। यह 'जापान' सिर्फ उस 1 किलोमीटर के दायरे में बनाया गया जहाँ से मुख्यमंत्री का काफिला गुज़रना था। बाकी अलीगढ़ आज भी उसी धूल, मलबे और टूटी सड़कों के बीच दम तोड़ रहा है। क्या प्रशासन को डर था कि अगर 'राजा' की नज़र असली अलीगढ़ पर पड़ गई, तो उनके माथे पर बल पड़ जाएंगे?
सांसद सतीश गौतम: विकास का अहंकार या शब्दों की मर्यादा का चीरहरण?
नुमाइश मैदान के मंच से अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम ने जो भाषण दिया, उसे सुनकर ऐसा लगा मानो अलीगढ़ रातों-रात 'कनॉट प्लेस' बन गया है। सांसद जी ने दावा किया कि "झाड़ू लगा लो, अगर सड़कों पर मिट्टी मिल जाए तो नाम बदल देना"। सांसद जी, क्या आप उन गलियों में भी गए जहाँ स्मार्ट सिटी के नाम पर खोदी गई सड़कों की धूल लोगों के फेफड़ों को छलनी कर रही है?
इतना ही नहीं, सांसद का लहजा इतना आक्रामक और अहंकारी था कि उन्होंने विकास न देख पाने वालों को 'नेत्रहीन' और 'गूंगे-बहरे' तक कह डाला। क्या एक जनप्रतिनिधि को अपनी ही जनता का ऐसा अपमान करना शोभा देता है? उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि अपराधी "ऊपर भेज दिए गए"। क्या न्याय की नई परिभाषा अब सिर्फ 'ऊपर भेजना' रह गई है? डिफेंस कॉरिडोर के नाम पर 'गोले' और 'पिस्तौल' का ज़िक्र कर जिस तरह से तालियां बटोरी गईं, क्या उससे स्थानीय युवाओं की बेरोज़गारी का दर्द कम हो जाएगा?
गरीबों की थाली पर 'सरकारी बुलडोजर' का प्रहार
जरा राजेश कुमार जैसे छोटे दुकानदारों की बात सुनिए, जिसका दो कमरों का स्टोर स्मार्ट सिटी के नाम पर ढहा दिया गया और अब उसके पास अपने ढाई साल के बच्चे की स्कूल फीस भरने तक के पैसे नहीं हैं। या आज़म अली को देखिए, जिसकी दुकान के सामने प्रशासन ने 4 फीट ऊँची स्टील की ग्रिल लगा दी ताकि ग्राहक अंदर ही न आ सकें। इन लोगों की आय में 40% तक की गिरावट आई है, लेकिन प्रशासन के लिए ये सिर्फ 'अतिक्रमण' है। ये कैसा 'न्याय' है जहाँ विकास की नींव गरीबों के आंसुओं पर रखी जा रही है ?
स्मार्ट सिटी या भ्रष्टाचार का अड्डा ?
करणी सेना ने जो आरोप लगाए हैं, वो इस पूरे तंत्र की पोल खोलते हैं। उनका साफ कहना है कि स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के नाम पर अलीगढ़ में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है। निर्माण कार्यों में पारदर्शिता का इतना अभाव है कि अधिकारी 'कच्चे नक्शों' (hand-drawn maps) के आधार पर लोगों के पुरखों के मकान ढहा रहे हैं।
लापरवाही का आलम यह है कि घटिया निर्माण कार्यों की वजह से आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं और लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। मलबे के ढेर सड़कों पर पड़े हैं, गटर खुले हैं और मच्छर पनप रहे हैं, लेकिन हुक्मरान सिर्फ कागज़ों पर 'स्मार्ट सिटी' की खुशियाँ मना रहे हैं।
इंसानियत का इंतज़ार: जब अर्थी को भी रास्ता नहीं मिला
इंसानियत का इंतज़ार: जब अर्थी को भी रास्ता नहीं मिला |
उन परिजनों के कंधों से पूछिए जिन पर अपनों का बोझ था, क्या मुख्यमंत्री की सुरक्षा मानवीय संवेदनाओं से भी बड़ी हो गई है? क्या हमारा सिस्टम इतना अंधा हो गया है कि उसे मर चुके व्यक्ति का सम्मान भी दिखाई नहीं देता?
विरोध के स्वर और 'गो बैक' की गूँज
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विरोध के स्वर और 'गो बैक' की गूँज |
वकीलों का गुस्सा भी सड़कों पर दिखा, जिन्होंने "काला कानून वापस लो" के नारों के साथ मुख्यमंत्री के घेराव की कोशिश की। आरोप है कि प्रशासन ने इन प्रदर्शनकारियों पर हल्का बल प्रयोग भी किया। क्या लोकतंत्र में अपनी बात रखना अब अपराध हो गया है?
एक राजनीतिक दौरा या पारिवारिक समारोह?
चर्चा तो यह भी गर्म रही कि मुख्यमंत्री का यह दौरा सरकारी से ज्यादा बरौली विधायक जयवीर सिंह के बेटे के 'टीका समारोह' में शामिल होने का व्यक्तिगत कार्यक्रम था। अगर ऐसा है, तो एक निजी कार्यक्रम के लिए आम जनता का करोड़ों रुपया और उनकी रोज़ी-रोटी क्यों दांव पर लगाई गई? अधिकारियों ने विपक्ष (समाजवादी पार्टी) के होर्डिंग्स को तो चुन-चुनकर नोचा ताकि 'राजा' खफा न हो जाएं, लेकिन क्या उन्होंने जनता के टूटे दिलों को जोड़ने की कोशिश की?
लखनऊ का वो अग्निकांड: मौत की आग और अधूरा दौरा
जब मुख्यमंत्री मंच से विकास की गंगा बहा रहे थे, उसी वक्त लखनऊ के अलीगंज में मौत का तांडव मच रहा था। एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग में 15 मासूम बच्चों की जान चली गई। कुछ छात्र अपनी जान बचाने के लिए खिड़कियों से कूद गए। यह घटना हमारे सिस्टम के खोखलेपन का सबसे बड़ा प्रमाण है।
मुख्यमंत्री को अपना अलीगढ़ दौरा बीच में ही छोटा करना पड़ा और वे लखनऊ के लिए रवाना हो गए। उन्होंने मुआवज़े और एसआईटी (SIT) जाँच की घोषणा तो कर दी, लेकिन क्या उन माँओं की गोद फिर से भर पाएगी जिनके बच्चे इस लापरवाही की भेंट चढ़ गए?
अलीगढ़ की जनता का सवाल
आज अलीगढ़ का हर छोटा व्यापारी, हर बेघर हुआ इंसान और हर बेरोज़गार युवा पूछ रहा है—ये कैसा विकास है? क्या विकास का मतलब सिर्फ पेड़ों को धोना और डिवाइडर रंगना है? क्या विकास का मतलब गरीबों के खोखे उजाड़ना है? क्या विकास का मतलब वीवीआईपी सुरक्षा के लिए अर्थियों को रोकना है?
साहब, मंच से दिए गए भाषणों से पेट नहीं भरता और न ही कागज़ी आंकड़ों से गरीबी दूर होती है। अलीगढ़ का ताला उद्योग आज भी अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है और स्मार्ट सिटी के नाम पर आम जनता सिर्फ मलबे और धूल के बीच जीने को मजबूर है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अलीगढ़ दौरा प्रशासनिक चश्मे से भले ही 'सफल' रहा हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यह दौरा प्रशासनिक चाटुकारिता, वीवीआईपी अहंकार और आम जनता के दमन की एक लंबी कहानी छोड़ गया है। विकास तभी सार्थक होगा जब वह आखिरी कतार में खड़े व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाए, न कि उसकी आँखों में आंसू।
अलीगढ़ अब जाग रहा है और वह सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं का ठोस समाधान चाहता है। हुक्मरान याद रखें, जनता सब जानती है!





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