अलीगढ़। हम अक्सर शादियों की चमक-धमक, नए कपड़ों और दावतों की बात करते हैं। लेकिन क्या हम कभी उस चेहरे के पीछे छिपे मानसिक दबाव को पढ़ पाते हैं? अलीगढ़ से आई दो खबरों ने दिल को झकझोर कर रख दिया है। दो नौजवान, जिनकी शादियां अभी महज़ दो महीने पहले हुई थीं, उन्होंने अपनी ज़िंदगी को फंदे के हवाले कर दिया।
मामूद नगर और गंगीरी: एक जैसी दो दर्दनाक दास्तानें
पहली घटना अलीगढ़ के मामूद नगर की है। यहाँ 28 साल के अज़मत अली ने अपने ही घर में फांसी लगाकर जान दे दी। उस वक्त उसकी पत्नी एक रिश्तेदार के यहाँ शादी में गई हुई थी। घर लौटकर जब खुशियां बांटनी थीं, तब वहां सिर्फ मातम बचा था।
दूसरी खबर गंगीरी के रहने वाले 25 साल के रोहित कुमार की है। रोहित जयपुर के एक अस्पताल में वार्ड बॉय का काम करता था। उसकी भी शादी को अभी सिर्फ दो महीने हुए थे, लेकिन उसने भी अपने कमरे में आत्महत्या कर ली।
"मर्द को दर्द नहीं होता" – क्या यही सोच जान ले रही है?
अक्सर हमारे समाज में लड़कों को बचपन से सिखाया जाता है कि "मजबूत बनो" या "मर्द रोते नहीं हैं"। नई शादी के बाद नए रिश्तों को निभाने की उम्मीदें, करियर का दबाव और भविष्य की जिम्मेदारियां कई बार एक पहाड़ जैसी लगने लगती हैं।
अज़मत और रोहित के मन में क्या चल रहा था, यह तो कोई नहीं जानता। लेकिन यह सच है कि कई बार इंसान बाहर से मुस्कुराता दिखता है, पर अंदर ही अंदर वह टूट रहा होता है। वह अपनी परेशानी किसी से साझा नहीं कर पाता क्योंकि उसे लगता है कि लोग उसे 'कमजोर' समझेंगे।
एक छोटी सी बात बचा सकती है किसी की जान
एक दोस्त और समाज का हिस्सा होने के नाते, हमारी जिम्मेदारी सिर्फ़ दावतों में शरीक होने तक नहीं है।
बात करें: अपने दोस्तों से पूछें कि वे वास्तव में कैसा महसूस कर रहे हैं।
सुनें, जज न करें: अगर कोई अपनी परेशानी बता रहा है, तो उसे 'कमजोरी' न कहें।
कंधे पर हाथ रखें: कभी-कभी बस इतना कह देना कि "मैं तुम्हारे साथ हूँ", किसी को हार मानने से रोक सकता है।
मेरी राय: अज़मत और रोहित की मौत सिर्फ दो परिवारों का नुकसान नहीं है, बल्कि हमारे समाज की विफलता भी है। हमें एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ कोई भी पुरुष अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में संकोच न करे।
क्या आपको भी लगता है कि हमें पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने की ज़रूरत है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर दें और अपने दोस्तों का हाल-चाल लेते रहें।
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