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| क्या आस्था के नाम पर हम अपनी प्रकृति को खत्म कर रहे हैं? सच कड़वा है! |
बचपन से हमें सिखाया गया है कि "कण-कण में भगवान हैं" और "नदी हमारी माँ है"। लेकिन ज़रा सोचिए, क्या कोई अपनी 'माँ' को ज़हरीले झाग और कचरे के ढेर में धकेल सकता है? आज जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर Viral हो रही हैं, वो सिर्फ तस्वीरें नहीं हैं, बल्कि हमारे सिस्टम और तथाकथित 'धार्मिक मान्यताओं' पर एक करारा तमाचा हैं। चलिए, आस्था और पर्यावरण के बीच चल रहे इस खेल का एक Deep Dive करते हैं!
"नदी को नदी" vs "नदी को माँ": एक कड़वी सच्चाई
हाल ही में सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिन्होंने इंटरनेट पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। एक तरफ अमेरिका (शिकागो) शहर की एकदम साफ और नीली नदी की तस्वीर है, जिस पर लिखा है "नदी को नदी मानने वाला देश"। और दूसरी तरफ हमारे देश की पवित्र नदियां हैं, जो कचरे और प्लास्टिक से अटी पड़ी हैं, और कैप्शन है- "नदी को माँ मानने वाला देश"।
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- बनारस के घाट हमारी धरोहर हैं, लेकिन क्या आस्था के नाम पर ऐसी गंदगी हम बर्दाश्त करेंगे?
अमीरों का कचरा और गरीबों की मजबूरी
- इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा Shocking तस्वीर वो है जहां कुछ महिलाएं नदी के ऊपर तैर रहे मोटे और ज़हरीले सफेद झाग (Toxic Foam) के बीच खड़ी होकर पूरे विधि-विधान से पूजा कर रही हैं।
- ये झाग कोई दैवीय चमत्कार नहीं है, बल्कि बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों से निकलने वाला खतरनाक इंडस्ट्रियल केमिकल है।
- किसी ने इंटरनेट पर बिल्कुल सही लिखा है- "अमीर लोगों ने गरीबों के पास भगवान के अलावा कुछ भी नहीं छोड़ा"।
इसका सबसे बड़ा नुकसान ये है कि अमीरों के कारखानों का कचरा आज इन गरीब महिलाओं की हेल्थ (स्किन और रेस्पिरेटरी प्रॉब्लम्स) के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। क्या आस्था के नाम पर लोगों को ज़हर में उतरने देना सही है?
कुंभ के नाम पर 100 साल पुराने पेड़ों की बलि?
सोशल मीडिया पर लोग सीधा सवाल पूछ रहे हैं कि जब 100 साल पुराने पेड़ काटे जा रहे हैं, तो "कोई संत इसके विरोध में नहीं आ रहा?"। इस पर किसी ने तंज कसते हुए रिप्लाई किया- "शायद तपस्या में बिजी हैं"।
एक तरफ संत तुकाराम महाराज जैसे महापुरुष थे जिन्होंने कहा था "वृक्षवल्ली आम्हा सोयरी वनचरे" (यानी पेड़-पौधे और जंगल हमारे सगे-संबंधी हैं)। और दूसरी तरफ आज का सिस्टम है जो आस्था के नाम पर पर्यावरण को दांव पर लगा रहा है।
- NGT का डंडा: नदियों की ऐसी खौफनाक स्थिति को देखते हुए जल्द ही प्राकृतिक नदियों में सीधे विसर्जन और पूजा करने पर सख्त बैन लग सकता है।आर्टिफिशियल घाट का
- Business: हर शहर में पूजा के लिए कंक्रीट के "आर्टिफिशियल घाट" या टैंक बनाना एक नया और बड़ा बिज़नेस बन जाएगा।
- Youth Movement का Benefit: आज का युवा सवाल पूछ रहा है। जल्द ही 'Eco-Friendly' रिवाज़ों की एक बड़ी लहर देखने को मिलेगी, जो प्रकृति को बचाने के लिए पुरानी विनाशकारी प्रथाओं के खिलाफ आवाज़ उठाएगी।
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