कानपुर में दरिंदगी: मां का कटा हाथ लेकर न्याय के लिए भटकता रहा ITBP जवान, प्राइवेट अस्पताल की खौफनाक सच्चाई

तड़पती मां, कटा हाथ और रोता ITBP जवान!

 देश की सीमा पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाला एक जवान अपनी मां के न्याय के लिए सिस्टम से हार गया। एक प्राइवेट अस्पताल की घोर लापरवाही से मां का हाथ कट गया, और इंसाफ न मिलने पर वह अपनी मां का कटा हुआ हाथ लेकर सीधे पुलिस कमिश्नर ऑफिस पहुंच गया... पढ़ें इस जवान के संघर्ष की पूरी रुला देने वाली कहानी।

कानपुर में दरिंदगी: मां का कटा हाथ लेकर न्याय के लिए भटकता रहा ITBP जवान, प्राइवेट अस्पताल की खौफनाक सच्चाई

  • कानपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज के दौरान गलत इंजेक्शन और लापरवाही के कारण ITBP जवान की 56 वर्षीय मां का दायां हाथ पूरी तरह से काला पड़ गया और अंततः काटना पड़ा।
  • 3 दिन तक न्याय के लिए भटकने के बाद, पीड़ित जवान एक थर्मोकोल बॉक्स में अपनी मां का कटा हुआ हाथ लेकर कानपुर पुलिस कमिश्नर के ऑफिस पहुंच गया।
  • स्वास्थ्य विभाग (CMO) द्वारा दी गई गोलमोल और संभावनाओं पर आधारित जांच रिपोर्ट से नाराज होकर, 60 ITBP जवानों ने पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंचकर कड़ा विरोध दर्ज कराया।
  • मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस कमिश्नर ने दोबारा जांच के सख्त आदेश दिए हैं, जिसमें CCTV फुटेज और तकनीकी साक्ष्यों की बारीकी से जांच की जाएगी।

देश की सीमाओं की हिफाजत करने वाले हमारे सैनिक अपनी जान की बाजी लगाकर हमें सुरक्षित रखते हैं, लेकिन क्या हमारा सिस्टम उनके परिवारों को सुरक्षित रख पा रहा है? उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक ऐसी झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जो हमारे मेडिकल सिस्टम की लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता की एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश करती है। यह कहानी है भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के एक बहादुर जवान विकास सिंह की, जो दुश्मनों से तो लड़ सकता है, लेकिन अपनी मां के लिए न्याय मांगने जब वह सिस्टम के दरवाजे पर पहुंचा, तो उसे सिर्फ निराशा और दर्द ही मिला।

बीमारी की शुरुआत और वह मनहूस रात मूल रूप से फतेहपुर के अलीमऊ गांव के रहने वाले विकास सिंह, ITBP की 32वीं बटालियन में कांस्टेबल के पद पर तैनात हैं और वर्तमान में उनकी पोस्टिंग कानपुर के महाराजपुर ITBP कैंप में है। 13 मई की वह तारीख विकास और उनके परिवार के लिए एक बुरे सपने की तरह साबित हुई। उनकी 56 वर्षीय मां, निर्मला देवी को अचानक सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगी और उन्हें कमजोरी व कब्ज की शिकायत भी थी। एक जिम्मेदार बेटे की तरह विकास अपनी मां को तुरंत महाराजपुर स्थित ITBP अस्पताल ले गए।

वहां के डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार देने के बाद उनकी गंभीर हालत को देखते हुए, उन्हें CAPF आयुष्मान स्वास्थ्य योजना के पैनल में शामिल एक बड़े अस्पताल (हायर सेंटर) के लिए रेफर कर दिया। विकास अपनी मां को एम्बुलेंस में ऑक्सीजन सपोर्ट पर लेकर उस अस्पताल की ओर निकल पड़े। लेकिन शाम के वक्त कानपुर के भारी ट्रैफिक जाम ने उनका रास्ता रोक लिया। अपनी मां की जान बचाने की जद्दोजहद में, विकास ने समय बर्बाद न करते हुए उन्हें रास्ते में ही पड़ने वाले टाटमिल इलाके के एक प्राइवेट अस्पताल (कृष्णा हॉस्पिटल) में भर्ती कराने का फैसला किया। उन्हें लगा कि अस्पताल उनकी मां की जान बचा लेगा, लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह फैसला उनकी मां की जिंदगी हमेशा के लिए बदल देगा।

अस्पताल की लापरवाही और काला पड़ता हाथ अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने निर्मला देवी की हालत को बेहद नाजुक बताया और उन्हें सीधे इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) में भर्ती कर लिया। परिवार को डराते हुए डॉक्टरों ने यहां तक कह दिया कि उनके बचने की उम्मीद सिर्फ 1 से 2 प्रतिशत ही है और शायद उन्हें तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता पड़े। हालांकि, रात भर में बिना वेंटिलेटर के ही निर्मला देवी की सांसें सामान्य होने लगीं।

लेकिन अगली सुबह, 14 मई को जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। जब निर्मला देवी को होश आया, तो उनका दायां हाथ पूरी तरह से काला पड़ चुका था और उसमें भयंकर सूजन आ गई थी। मां दर्द से बुरी तरह चीख रही थी। विकास का आरोप है कि ऑक्सीजन सपोर्ट के दौरान हाथ में कैन्युला (IV line) के जरिए गलत इंजेक्शन लगाया गया था, जिसके कारण इंफेक्शन फैल गया। जब विकास ने अस्पताल के स्टाफ को इस बारे में बताया, तो उन्होंने लापरवाही से सिर्फ उनके हाथ से IV लाइन हटा दी। डॉक्टरों ने उनकी चिंताओं को यह कहकर खारिज कर दिया कि पट्टी (ड्रैसिंग) करने के बाद हालत में सुधार हो जाएगा। पूरे दिन मां तड़पती रही, लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने कोई उचित ध्यान नहीं दिया।

हाथ काटने की नौबत और एक बेटे की बेबसी अस्पताल की इस घोर लापरवाही को देखते हुए विकास ने अपने बटालियन के अधिकारियों से संपर्क किया, जिन्होंने तुरंत उन्हें किसी दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह दी। 14 मई की शाम को विकास ने अपनी मां को वहां से डिस्चार्ज कराया और बिठूर रोड बैकुंठपुर स्थित एक अन्य प्राइवेट अस्पताल (पारस अस्पताल) में भर्ती कराया।

वहां के डॉक्टरों ने जब जांच की, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। डॉक्टरों ने बताया कि कलाई के आगे खून का संचार (Blood circulation) पूरी तरह से बंद हो चुका है। खून को पतला करने के लिए डॉक्टरों ने 40,000 रुपये का एक बेहद महंगा इंजेक्शन भी लगाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इंफेक्शन को पूरे शरीर में फैलने से रोकने और निर्मला देवी की जान बचाने के लिए, डॉक्टरों के पास केवल एक ही खौफनाक विकल्प बचा था। 17 मई को, विकास की आंखों के सामने उनकी मां का दायां हाथ काट दिया गया। एक बेटा जो देश की रक्षा करता है, वह अपनी मां का हाथ कटते हुए देखने के लिए मजबूर था। विकास ने रुंधे गले से कहा, "मेरी मां का हाथ मेरे सामने ही काट दिया गया"।

न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें और थर्मोकोल बॉक्स में कटा हुआ हाथ अपनी मां के इस दर्द और अस्पताल की लापरवाही से आक्रोशित विकास ने न्याय के लिए सिस्टम का दरवाजा खटखटाया। वे लगातार दो दिनों तक रेलबाजार पुलिस स्टेशन और ACP कार्यालय के चक्कर काटते रहे, लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी। "हर कोई सिर्फ कागज इकट्ठा कर रहा है। कोई कहता है CMO जांच करेगा, कोई कहता है पुलिस जांच करेगी। कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है," विकास ने अपना दर्द बयां किया।

जब हर जगह से निराशा मिली, तो 19 मई को इस मामले ने एक दिल दहला देने वाला मोड़ लिया। विकास अपनी मां का कटा हुआ हाथ एक थर्मोकोल बॉक्स में लेकर सीधे कानपुर के पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल के कार्यालय पहुंच गए। पुलिस कमिश्नरेट में यह भयानक दृश्य देखकर हर कोई सन्न रह गया। विकास ने रोते हुए एडिशनल पुलिस कमिश्नर (लॉ एंड ऑर्डर) शिवा सिंह से कहा, "जिस मां ने मुझे इतने प्यार से पाला, आज मैं उसी का कटा हुआ हाथ लेकर भटक रहा हूं। मैं पिछले तीन दिनों से अपनी मां का कटा हाथ लेकर घूम रहा हूं, हमें सिर्फ न्याय चाहिए"।

लीपापोती वाली रिपोर्ट और ITBP जवानों का आक्रोश पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. हरिदत्त नेमी को मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। लेकिन न्याय की उम्मीद पर तब पानी फिर गया, जब शुक्रवार को CMO कार्यालय ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी। यह रिपोर्ट स्पष्ट तथ्यों के बजाय केवल "संभावनाओं" (probabilities) पर आधारित थी। रिपोर्ट में किसी भी डॉक्टर या अस्पताल को स्पष्ट रूप से दोषी नहीं ठहराया गया था। खुद पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने इस रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि रिपोर्ट स्पष्ट होनी चाहिए, न कि संभावनाओं पर आधारित। उन्होंने CMO से स्पष्ट रूप से जवाबदेही तय करने और मामला दर्ज करने की सिफारिश करने को कहा।

स्वास्थ्य विभाग की इस लीपापोती से ITBP के जवानों का गुस्सा फूट पड़ा। 23 मई (शनिवार) की सुबह, कानपुर पुलिस कमिश्नरेट में एक अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला। लगभग 15 गाड़ियों (जीप और ट्रकों) में सवार होकर 40 से 60 हथियारों से लैस ITBP के जवान और अधिकारी पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंच गए। जवानों ने परिसर को घेर लिया और स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट पर कड़ा असंतोष व्यक्त किया। उनका आरोप था कि जिले के सरकारी चिकित्सा अधिकारी, प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टरों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। लगभग एक घंटे तक कमिश्नरेट में तनाव का माहौल बना रहा।

कमांडेंट का दखल और दोबारा जांच के सख्त आदेश स्थिति की नजाकत को देखते हुए, ITBP के कानपुर कमांडेंट गौरव प्रसाद ने खुद पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल और एडिशनल CP विपिन कुमार टांडा से मुलाकात की। इस हाई-प्रोफाइल बैठक में CMO डॉ. हरिदत्त नेमी को भी तुरंत तलब किया गया।

ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर विपिन कुमार टांडा ने बाद में स्पष्ट किया कि ITBP जवान अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बात करने आए थे और उनके साथी बाहर खड़े थे, जिसे "घेराव" के रूप में गलत तरीके से लिया गया। बैठक में ITBP अधिकारियों ने जांच रिपोर्ट के कई बिंदुओं पर अपनी असहमति जताई।

कमिश्नर रघुबीर लाल ने सख्त रुख अपनाते हुए CMO को निर्देश दिया कि इस गंभीर लापरवाही के हर पहलू की दोबारा और बारीकी से जांच की जाए। CMO डॉ. हरिदत्त नेमी ने घोषणा की कि दो वरिष्ठ अधिकारियों के नेतृत्व में एक नई जांच टीम का गठन किया गया है। इस नई जांच में केवल कागजी कार्यवाही नहीं होगी, बल्कि अस्पताल के CCTV फुटेज, इलाज से जुड़े तकनीकी साक्ष्यों और मेडिकल रिकॉर्ड को भी बारीकी से खंगाला जाएगा।

ITBP कमांडेंट गौरव प्रसाद ने कहा, "हमने पुलिस कमिश्नर साहब से मुलाकात कर एक निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है, ताकि पीड़िता को न्याय मिल सके। हमें पुलिस की तरफ से पूरा सपोर्ट मिल रहा है"।

अस्पताल के काले कारनामे? यह मामला सिर्फ एक लापरवाही का नहीं लगता। ITBP के संपर्क अधिकारी अर्पित सिंह ने एक बेहद चौंकाने वाला आरोप लगाया है कि इसी प्राइवेट अस्पताल में इलाज के दौरान पहले भी ITBP की एक महिला कांस्टेबल और एक इंस्पेक्टर की मौत हो चुकी है। हालांकि, इन आरोपों की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यह इस अस्पताल की कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

एक जवान, जो सरहदों पर सीना ताने खड़ा रहता है, उसे अपने ही देश के भ्रष्ट और लापरवाह मेडिकल सिस्टम से लड़ना पड़ रहा है। यह घटना सिर्फ विकास सिंह के परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि देश के उन तमाम आम नागरिकों की बेबसी का प्रतीक है, जो प्राइवेट अस्पतालों के भारी-भरकम बिल तो चुकाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ मौत या अपंगता मिलती है। अब पूरे देश की निगाहें कानपुर प्रशासन की इस नई जांच पर टिकी हैं। क्या निर्मला देवी को न्याय मिलेगा? क्या दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाएगा? या एक बार फिर कागजों में सच्चाई दफन कर दी जाएगी?

 देश की रक्षा करने वाले एक सैनिक को अपनी मां के इंसाफ के लिए कटा हुआ हाथ लेकर भटकना पड़े, यह हमारे सिस्टम के बारे में क्या कहता है? क्या आपको लगता है कि प्राइवेट अस्पतालों की लापरवाही और मनमानी को रोकने के लिए हत्या के प्रयास जैसा सख्त कानून बनना चाहिए? अपनी बेबाक राय और गुस्सा नीचे कमेंट्स में जरूर दर्ज करें!


Post a Comment

0 Comments